मानवता सबसे बड़ा धर्म है। मनुष्य के रूप में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति इस बात को भली भांति जनता और समझाता है। बावजूद इसके लोगों को लोगों से नफरत और अदावत क्यों है? क्या इसके लिए धर्म या आस्था का दोष है या एक दुसरे पर अपना प्रभुत्व कायम करने की लालसा का दोष। यह भी लोग जानते हैं कि जब से ये दुनिया कायम है तब से अब तक वर्चस्व की लड़ाई चली आ रही है और रहती दुनिया तक चलती रहे गी। आस्था और धर्म तो सिर्फ एक बहाना है। इसके आड़ में केवल सत्ता सुख भोगने का स्वार्थ निहित है। आस्था और धर्म व जाति प्रेम दिखाने या सडकों पर प्रदर्शन करने की चीज नहीं है। ये ऐसी चीज है जो मानव शरीर के अंग प्रत्यंग में स्वत:भरी हुई होती है। लेकिन इसका एहसास कम ही लोगों को हो पता है। जिन लोगों ने आस्था और विश्वास के वास्तविक शक्ति को पहचान लिया है वे धर्म और जाति के आधार पर लोगों में विभेद पसंद नहीं करते लेकिन कुच्छ लोग ऐसे हैं जो इसकी शक्ति को भुनाकर अपना निहित स्वार्थ साधने से नहीं चुकते। इन्हीं का देन है जातिगत विभेद और जिसका परिणाम हमें क्षेत्रवाद, नक्सलवाद, जातिवाद और आतंकवाद के रूप में देखने को मिल रहा है। इसका जड़ काफी मजबूत होता जा रहा है। जो कभी भी पूरी इंसानियत को अपने जाल में जकड सकता है।
आज विश्व स्तर या राष्ट्री स्तर जो कुच्छ भी हो रहा भी वह उसी का नतीजा है।चंद लोग अपने अहंकार की वजह से मानव समाज को रौंद रहे हैं जिनका साथ वे लोग दे रहे हैं जिन्होंने आस्था को सही ढंग समझा नहीं है। दुराग्रह से ग्रसित लोग उन्हें जो रास्ता दिखाते हैं, वे सच्च मान कर उसी पर चल पड़ते हैं। जिसका परिणाम यह है कि लोग जातीय और धार्मिक सीमा की परिधि के इर्द गिर्द ही सीमित हो कर रह जाते हैं और उन्हें जिंदगी के अन्य मूल्यों की जानकारी हासिल करने का अवसर नहीं मिल पाता। जिसका परिणाम है की लोगों के मध्य जाति और धर्म के नाम पर दूरी बढती जा रही है और वैमनष्यता की खाई गहरी होती जा रही है।
हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है। यहाँ की तहजीब गंगा यमुनी तहजीब के नाम से जानी जाती है। हिंदुस्तान की मिट्टी में पले बढे लोगों में आर्यों के समय से लेकर मुग़ल सल्तनत तक नफ़रत और अलगाव नाम की कोई चीज नहीं थी। लेकिन इस दरम्यान वर्चस्व की लड़ाई होती रही। हमारे देश में नफरत की बीज अंग्रेजों द्वार १८५७ में बोई गयी। फूट डालो और राज करो की निति अपना कर अंग्रेजी हुकूमत ने देश के दोनों बाजुओं को अलग कर दिया और देश के इन दोनों पहलुओं के बीच इतनी गहरी दरार पैदा कर दिया कि लाख प्रयास के बावजूद भी न भरा जा सके। उन्हीकी बोई नफ़रत की बीज आज भी हमारे देश में आतंक वाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद और नक्सलवाद के रूप में काफी फल फुल रहा है। देश भले ही यह दावा कर रहा हो कि हम भी विश्व के शक्तिशाली देशों की श्रेणी में शामिल हैं लेकिन वास्तविक्ता यह है कि जब तक देश का आम नागरिक क्षेत्रवाद, जातिवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद के संकुचित दायरे से निकलकर बाहर नहीं आ जाता तब तक देश अपने उस मंजिल को हांसिल नहीं कर सकता।
मेरी नज़रों में इन समस्याओं से निजात पाने का सबसे आसान रास्ता यह है कि देश में बढती बेरोजगारी पर अंकुश लगाया जाए। ताकि लोगों को भूख मरी से निजात जाए ।
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