शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

मजहब नहीं sikhaata --------

मानवता सबसे बड़ा धर्म है। मनुष्य के रूप में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति इस बात को भली भांति जनता और समझाता है। बावजूद इसके लोगों को लोगों से नफरत और अदावत क्यों है? क्या इसके लिए धर्म या आस्था का दोष है या एक दुसरे पर अपना प्रभुत्व कायम करने की लालसा का दोष। यह भी लोग जानते हैं कि जब से ये दुनिया कायम है तब से अब तक वर्चस्व की लड़ाई चली आ रही है और रहती दुनिया तक चलती रहे गी। आस्था और धर्म तो सिर्फ एक बहाना है। इसके आड़ में केवल सत्ता सुख भोगने का स्वार्थ निहित है। आस्था और धर्म व जाति प्रेम दिखाने या सडकों पर प्रदर्शन करने की चीज नहीं है। ये ऐसी चीज है जो मानव शरीर के अंग प्रत्यंग में स्वत:भरी हुई होती है। लेकिन इसका एहसास कम ही लोगों को हो पता है। जिन लोगों ने आस्था और विश्वास के वास्तविक शक्ति को पहचान लिया है वे धर्म और जाति के आधार पर लोगों में विभेद पसंद नहीं करते लेकिन कुच्छ लोग ऐसे हैं जो इसकी शक्ति को भुनाकर अपना निहित स्वार्थ साधने से नहीं चुकते। इन्हीं का देन है जातिगत विभेद और जिसका परिणाम हमें क्षेत्रवाद, नक्सलवाद, जातिवाद और आतंकवाद के रूप में देखने को मिल रहा है। इसका जड़ काफी मजबूत होता जा रहा है। जो कभी भी पूरी इंसानियत को अपने जाल में जकड सकता है।

आज विश्व स्तर या राष्ट्री स्तर जो कुच्छ भी हो रहा भी वह उसी का नतीजा है।चंद लोग अपने अहंकार की वजह से मानव समाज को रौंद रहे हैं जिनका साथ वे लोग दे रहे हैं जिन्होंने आस्था को सही ढंग समझा नहीं है। दुराग्रह से ग्रसित लोग उन्हें जो रास्ता दिखाते हैं, वे सच्च मान कर उसी पर चल पड़ते हैं। जिसका परिणाम यह है कि लोग जातीय और धार्मिक सीमा की परिधि के इर्द गिर्द ही सीमित हो कर रह जाते हैं और उन्हें जिंदगी के अन्य मूल्यों की जानकारी हासिल करने का अवसर नहीं मिल पाता। जिसका परिणाम है की लोगों के मध्य जाति और धर्म के नाम पर दूरी बढती जा रही है और वैमनष्यता की खाई गहरी होती जा रही है।

हिंदुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है। यहाँ की तहजीब गंगा यमुनी तहजीब के नाम से जानी जाती है। हिंदुस्तान की मिट्टी में पले बढे लोगों में आर्यों के समय से लेकर मुग़ल सल्तनत तक नफ़रत और अलगाव नाम की कोई चीज नहीं थी। लेकिन इस दरम्यान वर्चस्व की लड़ाई होती रही। हमारे देश में नफरत की बीज अंग्रेजों द्वार १८५७ में बोई गयी। फूट डालो और राज करो की निति अपना कर अंग्रेजी हुकूमत ने देश के दोनों बाजुओं को अलग कर दिया और देश के इन दोनों पहलुओं के बीच इतनी गहरी दरार पैदा कर दिया कि लाख प्रयास के बावजूद भी न भरा जा सके। उन्हीकी बोई नफ़रत की बीज आज भी हमारे देश में आतंक वाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद और नक्सलवाद के रूप में काफी फल फुल रहा है। देश भले ही यह दावा कर रहा हो कि हम भी विश्व के शक्तिशाली देशों की श्रेणी में शामिल हैं लेकिन वास्तविक्ता यह है कि जब तक देश का आम नागरिक क्षेत्रवाद, जातिवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद के संकुचित दायरे से निकलकर बाहर नहीं आ जाता तब तक देश अपने उस मंजिल को हांसिल नहीं कर सकता।

मेरी नज़रों में इन समस्याओं से निजात पाने का सबसे आसान रास्ता यह है कि देश में बढती बेरोजगारी पर अंकुश लगाया जाए। ताकि लोगों को भूख मरी से निजात जाए ।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

derpan: मैं और गावं का --------

derpan: मैं और गावं का --------: "पत्रकारिता एक अमूल्य और प्रतिष्ठा परक कार्य है। इससे जुड़ा हर व्यक्ति इस बात को अच्छी तरह जनता है। इसे देश का चौथा अस्तम्भ माना गया है। इसके ..."

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

मैं और गावं का --------

पत्रकारिता एक अमूल्य और प्रतिष्ठा परक कार्य है। इससे जुड़ा हर व्यक्ति इस बात को अच्छी तरह जनता है। इसे देश का चौथा अस्तम्भ माना गया है। इसके अन्दर जो शक्ति है उसका अंदाजा पत्रकारिता से जुड़े हर व्यक्ति को है। आज के दौर में लोग इसका उपयोग अपने अपने तरीके से कर रहे हैं। जिससे पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास हो रहा है।
मैं भी इस कार्य झेत्र जुड़ा हूँ, वो भी इत्तेफाकन। इस कार्य झेत्र में आने से पूर्व मैंने इसके लिए बाकायदा तौरपर कोई ट्रेनिग नहीं ली। लेकिन जब मैं इस झेत्र से जुड़े कुछ बुद्धिजीवी लोगों के सम्पर्क में आया और उनके सानिध्य में काम करना शुरू किया तो मुझे पत्रकारिता के बारे जानकारी प्राप्त हुई। मैंने जिन लोगों के सानिध्य में काम करना शुरू किया वे लोग मेरी नज़रों में पत्रकारिता की एक संस्था हैं। मैंने बतौर रिपोर्टर , समाचार रिपोर्टिंग की शुरुआत '' अमर उजाला '' से की। उस समय गाजीपुर व्यूरो कार्यालय में अजय राय व्यूरो चीफ और अभय नारायण राय स्ट्रिगर हुआ करते थे। यही वह पहले व्यक्ति हैं,जिन्होंने मुझे पत्रकारिता का गुण सिखाया। इनके सानिध्य में मैंने लगभग ३ वर्षों तक यह कार्य किया। इस बीच इस समाचार पत्र के कार्यालय का प्रभार दो अन्य चीफ व्यूरो आसिफ अली और कमल वर्मा ने बरी बरी संभाली , जिनके सानिध्य में काम करने का मौका मिला। कमल वर्मा के सानिध्य में मैंने निर्भीक पत्रकारिता का गुण सीखा। इन्ही के दौर में संयोग से मैं अमर उजाला से अलग होकर '' हिंदुस्तान '' से जुड़ा और मुझे सियाराम यादव जी जैसे महान कलम के सिपाही के सानिध्य में काम करने का मौका मिला। इनसे मैंने सच्ची और निषपक्ष पत्रकारिता के गुण सीखे । इनके सानिध्य में मुझे पत्रकारिता के वास्तविक मूल्यों का ज्ञान प्राप्त हुआ।इनके पश्चात् गाजीपुर हिंदुस्तान कार्यालय का प्रभारी राकेश मिश्रा बने। इनके साथ २ फरवरी २००७ से पूर्व लगभग तीन वर्ष तक कार्य करने का अवसर मिला। इनके सानिध्य में लगन और मेहनत से काम करने का मौका मिला। शुरूआती दो वर्ष तो काफी बेहतर और शानदार गुजरा।किन्तु आखरी एक साल काफी उत्थल पुत्थल भरा रहा। कार्यालय के एक कर्मचारी द्वारा मुझे क्षेत्र की आम जन समस्याओं को उठाने से रोका जाने लगा। क्योंकि उन समस्याओं का संबंध सपा सरकार में एक मंत्री से था। उक्त मंत्री द्वारा मुझे प्रलोभन भी दिया गया किन्तु मैंने उसे ठुकरा दिया। लेकिन आफिस वाले उससे मिलकर मेरे विरुद्ध जालसाजी करना शुरू कर दिए। मेरे और आफिस वालों के बीच दुरी बढ गयी और आखिर मुझे पत्रकारिता से हाथ धोनी पड़ी। लगभग चार वर्ष तक मुझे पत्रकारिता से दूर रहना पड़ा। इस दरम्यान मैं प्रयास करता रहा कि मुझे किसी भी अखबार में लिखने का मौका मिलजाए।मुझे वह अवसर मिला २६ जून २०१० को पुन: ' अमर उजाला ' से, जब गाजीपुर कार्यालय का प्रभार नागेन्द्र पंकज जी ने सम्भाला। मेरे कुछ हमदर्द दोस्तोंने उनसे मेरे बारे में बात की और उन्होंने मुझ पर विश्वास करते हुए अपने टीम में शामिल कर लिया।