गुरुवार, 6 जनवरी 2011

मैं और गावं का --------

पत्रकारिता एक अमूल्य और प्रतिष्ठा परक कार्य है। इससे जुड़ा हर व्यक्ति इस बात को अच्छी तरह जनता है। इसे देश का चौथा अस्तम्भ माना गया है। इसके अन्दर जो शक्ति है उसका अंदाजा पत्रकारिता से जुड़े हर व्यक्ति को है। आज के दौर में लोग इसका उपयोग अपने अपने तरीके से कर रहे हैं। जिससे पत्रकारिता के मूल्यों का ह्रास हो रहा है।
मैं भी इस कार्य झेत्र जुड़ा हूँ, वो भी इत्तेफाकन। इस कार्य झेत्र में आने से पूर्व मैंने इसके लिए बाकायदा तौरपर कोई ट्रेनिग नहीं ली। लेकिन जब मैं इस झेत्र से जुड़े कुछ बुद्धिजीवी लोगों के सम्पर्क में आया और उनके सानिध्य में काम करना शुरू किया तो मुझे पत्रकारिता के बारे जानकारी प्राप्त हुई। मैंने जिन लोगों के सानिध्य में काम करना शुरू किया वे लोग मेरी नज़रों में पत्रकारिता की एक संस्था हैं। मैंने बतौर रिपोर्टर , समाचार रिपोर्टिंग की शुरुआत '' अमर उजाला '' से की। उस समय गाजीपुर व्यूरो कार्यालय में अजय राय व्यूरो चीफ और अभय नारायण राय स्ट्रिगर हुआ करते थे। यही वह पहले व्यक्ति हैं,जिन्होंने मुझे पत्रकारिता का गुण सिखाया। इनके सानिध्य में मैंने लगभग ३ वर्षों तक यह कार्य किया। इस बीच इस समाचार पत्र के कार्यालय का प्रभार दो अन्य चीफ व्यूरो आसिफ अली और कमल वर्मा ने बरी बरी संभाली , जिनके सानिध्य में काम करने का मौका मिला। कमल वर्मा के सानिध्य में मैंने निर्भीक पत्रकारिता का गुण सीखा। इन्ही के दौर में संयोग से मैं अमर उजाला से अलग होकर '' हिंदुस्तान '' से जुड़ा और मुझे सियाराम यादव जी जैसे महान कलम के सिपाही के सानिध्य में काम करने का मौका मिला। इनसे मैंने सच्ची और निषपक्ष पत्रकारिता के गुण सीखे । इनके सानिध्य में मुझे पत्रकारिता के वास्तविक मूल्यों का ज्ञान प्राप्त हुआ।इनके पश्चात् गाजीपुर हिंदुस्तान कार्यालय का प्रभारी राकेश मिश्रा बने। इनके साथ २ फरवरी २००७ से पूर्व लगभग तीन वर्ष तक कार्य करने का अवसर मिला। इनके सानिध्य में लगन और मेहनत से काम करने का मौका मिला। शुरूआती दो वर्ष तो काफी बेहतर और शानदार गुजरा।किन्तु आखरी एक साल काफी उत्थल पुत्थल भरा रहा। कार्यालय के एक कर्मचारी द्वारा मुझे क्षेत्र की आम जन समस्याओं को उठाने से रोका जाने लगा। क्योंकि उन समस्याओं का संबंध सपा सरकार में एक मंत्री से था। उक्त मंत्री द्वारा मुझे प्रलोभन भी दिया गया किन्तु मैंने उसे ठुकरा दिया। लेकिन आफिस वाले उससे मिलकर मेरे विरुद्ध जालसाजी करना शुरू कर दिए। मेरे और आफिस वालों के बीच दुरी बढ गयी और आखिर मुझे पत्रकारिता से हाथ धोनी पड़ी। लगभग चार वर्ष तक मुझे पत्रकारिता से दूर रहना पड़ा। इस दरम्यान मैं प्रयास करता रहा कि मुझे किसी भी अखबार में लिखने का मौका मिलजाए।मुझे वह अवसर मिला २६ जून २०१० को पुन: ' अमर उजाला ' से, जब गाजीपुर कार्यालय का प्रभार नागेन्द्र पंकज जी ने सम्भाला। मेरे कुछ हमदर्द दोस्तोंने उनसे मेरे बारे में बात की और उन्होंने मुझ पर विश्वास करते हुए अपने टीम में शामिल कर लिया।